Wednesday, 23 April 2014

मेरे पहाड़ में नशा चड़ने लगा होगा ,


हल्के चटके कांच के गिलास 
निकलने लगे होंगे ...
नुक्कड़ बाजारों में 
दीवारों के पीछे छिपे कोनों में 
संसद सजने लगी होगी ..
दारू की ब्रांड और खुशबु में 
वोट इधर उधर होंगे 
और विशेष दबंगों के लिए 
मुर्गे पलने लगे होंगे ....

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इंदिरा के किस्सों की बहार होगी
अटल के मान की बात होगी
आन्दोलन का कोदा भी पकेगा
'और झंगोरा भी फुकेगा
डेमोक्रेसी के डांस में जोशी
का लाल झंडा भी उठेगा
मगर शाम ...
शाम ...
शाम ...
शाम मेरा पहाड़
नेपथ्य में बैठा ,डूबते वर्तमान
पर इतराता उतरेगा
हल्के चटके कांच के गिलास में ...

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तुमने रंग देखा है ,
गिलास में उड़ेली जा रही
शराब का ,
वोट वाली शराब का ..
गोर से देखो
पहाड़ घोल-घोल के
बोतल बंद हुई है .
सिर्फ तुम्हारा वोट नहीं लेगी
इस बार
तकदीर लेगी बड़ी इठलाती
हल्के चटके कांच के गिलास में ..

गौरव नैथानी